अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥
antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śarīriṇaḥ |anāśino'prameyasya tasmādyudhyasva bhārata ||
जो देहधारी आत्मा नित्य, अविनाशी और अप्रमेय है, उसके ये शरीर नाशवान कहे गए हैं। इसलिए हे भारत, तुम युद्ध करो।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं, जो युद्ध करने से हिचक रहा है। वे नश्वर शरीर और उसमें रहने वाली नित्य, अप्रमेय आत्मा (शरीरी) का भेद बताते हैं, इसलिए मृत्यु पर शोक करना उचित नहीं। इसी आधार पर वे उसे अपना कर्तव्य (धर्म) निभाने को कहते हैं; कुछ परंपराएँ इसे मुख्यतः कर्तव्य का आह्वान मानती हैं और कुछ आत्मज्ञान का संकेत, और अनेक इसे दोनों मानती हैं।