हे परंतप! हृषीकेश से इस प्रकार कहकर गुडाकेश ने गोविन्द से कहा, "मैं युद्ध नहीं करूँगा," और फिर चुप हो गया।
व्याख्या
संजय राजा धृतराष्ट्र को बता रहे हैं कि अपने गुरुजनों और स्वजनों से लड़ने के शोक में डूबे अर्जुन ने युद्ध से मना कर दिया। यहाँ "परंतप" (शत्रुओं को तपाने वाला) धृतराष्ट्र के लिए संबोधन है, और "गुडाकेश" (निद्रा को जीतने वाला, या घने केशों वाला) अर्जुन का नाम है। उसकी यह चुप्पी अगले श्लोक से शुरू होने वाले कृष्ण के उपदेश की भूमिका बनती है।