श्रीकृष्ण
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः । इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥
yatato hyapi kaunteya puruṣasya vipaścitaḥ | indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṃ manaḥ ||
हे कुन्तीपुत्र! प्रयत्न करते रहने वाले विवेकशील मनुष्य के भी मन को ये क्षुब्ध कर देने वाली इन्द्रियाँ बलपूर्वक खींच ले जाती हैं।
व्याख्या कृष्ण अर्जुन को स्थिरबुद्धि पुरुष के बारे में समझा रहे हैं और यहाँ चेतावनी देते हैं कि संयम आसान नहीं है। विवेकशील (विपश्चित्) व्यक्ति प्रयत्न करे, तब भी उत्तेजित करने वाली इन्द्रियाँ उसके मन को खींच ले जा सकती हैं। अगले श्लोक में इसका उपाय बताया गया है: इन्द्रियों को वश में करके कृष्ण में लगा रहना।
पिछला श्लोक 2.59 अध्याय 2 · ज्ञान का मार्ग अगला श्लोक 2.61
भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
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