परंतु जो साधक राग और द्वेष से मुक्त तथा अपने वश में की हुई इंद्रियों के साथ विषयों के बीच विचरता है, वह संयमित मन वाला व्यक्ति प्रसन्नता और शांति को प्राप्त करता है।
व्याख्या
पिछले श्लोकों में कृष्ण ने विषयों के चिंतन से होने वाले पतन को बताया था। यहाँ वे विपरीत स्थिति बताते हैं: यदि इंद्रियाँ राग और द्वेष से मुक्त होकर आत्मा के वश में हों, तो व्यक्ति विषयों के बीच रहकर भी बँधता नहीं और प्रसाद, यानी मन की निर्मल शांति पाता है। टीकाकार "आत्मा" का अर्थ संयमित मन या भीतरी आत्मा अलग-अलग ढंग से लेते हैं, पर सभी मानते हैं कि असली बात भीतर का संयम है, संसार से भागना नहीं।