जो मनुष्य इंद्रिय-विषयों का बार-बार चिंतन करता रहता है, उसमें उनके प्रति आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना जन्म लेती है, और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।
व्याख्या
श्रीकृष्ण ने अभी स्थिर बुद्धि वाले उस व्यक्ति का वर्णन किया है जिसने इंद्रियों को वश में कर रखा है। अब वे बताते हैं कि मन उस स्थिरता से कैसे फिसल जाता है। विषयों का निरंतर चिंतन पहले आसक्ति (सङ्ग), फिर कामना (काम) और फिर क्रोध को जन्म देता है; परंपरा में समझा जाता है कि कामना में बाधा पड़ने पर क्रोध उठता है।