āścaryavatpaśyati kaścidenamāścaryavadvadati tathaiva cānyaḥ |āścaryavaccainamanyaḥ śrṛṇotiśrutvāpyenaṃ veda na caiva kaścit ||
कोई इस आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है, कोई दूसरा इसके बारे में आश्चर्य की तरह बताता है, और कोई अन्य इसे आश्चर्य की तरह सुनता है। पर सुनकर भी कोई इसे वास्तव में नहीं जान पाता।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को उस अविनाशी आत्मा के बारे में समझा रहे हैं, जिसका वर्णन पिछले श्लोकों में आया है। वे कहते हैं कि आत्मा इतनी सूक्ष्म और अद्भुत है कि उसे देखना, बताना और सुनना, तीनों ही विस्मय जगाते हैं, और उसे पूरी तरह समझ लेना दुर्लभ है। अंतिम पंक्ति को कुछ भाष्यकार इस अर्थ में लेते हैं कि कोई भी आत्मा को पूरी तरह नहीं जानता, जबकि कुछ का मत है कि बहुत कम लोग ही उसे समझ पाते हैं।