अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥
avyaktādīni bhūtāni vyaktamadhyāni bhārata |avyaktanidhanānyeva tatra kā paridevanā ||
हे भारत! सभी प्राणी आरंभ में अप्रकट होते हैं, बीच में प्रकट दिखते हैं, और अंत में फिर अप्रकट हो जाते हैं। तब इसमें विलाप कैसा?
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को सांत्वना दे रहे हैं, जो अपने ही संबंधियों से युद्ध की बात सोचकर शोक में डूबा है। वे कहते हैं कि प्राणी जन्म से पहले अप्रकट (अव्यक्त) थे, बीच में कुछ समय के लिए दिखते हैं, और मृत्यु के बाद फिर अप्रकट हो जाते हैं। जब यही सबका स्वाभाविक क्रम है, तो इस पर शोक करना व्यर्थ है। परंपराएँ इसे अलग ढंग से पढ़ती हैं: कुछ इसे नश्वरता की याद मानती हैं, तो कुछ दृश्य अवस्था के पीछे किसी अपरिवर्तनीय सत्ता का संकेत।