हे पार्थ, यह बुद्धि तुम्हें सांख्य के दृष्टिकोण से बताई गई। अब इसे योग के दृष्टिकोण से सुनो। इस बुद्धि से युक्त होकर तुम कर्म के बंधन को त्याग दोगे।
व्याख्या
कृष्ण अब तक दिए गए आत्मा के ज्ञान, जिसे यहाँ सांख्य (आत्मा और तत्त्व का विवेचन) कहा गया है, से आगे बढ़कर योग (अनुशासित कर्म) की व्यावहारिक राह बताने लगते हैं। यहाँ बुद्धि का अर्थ स्थिर और विवेकपूर्ण समझ है। वे वचन देते हैं कि इस बुद्धि से कर्म करने पर अर्जुन कर्मबंधन से, यानी कर्मफल से बँध जाने से, मुक्त हो जाएगा। कुछ परंपराएँ 'सांख्य' को ज्ञान का दर्शन मानती हैं और कुछ केवल 'तर्कपूर्ण व्याख्या'; दोनों ही मतों में यह श्लोक कर्मयोग के उपदेश की भूमिका बनाता है।