नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
nehābhikramanāśo'sti pratyavāyo na vidyate |svalpamapyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt ||
इस मार्ग में किया गया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता, और इसमें कोई दोष या हानि भी नहीं होती। इस धर्म का थोड़ा-सा पालन भी महान भय से रक्षा करता है।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं, जिन्हें उन्होंने अभी बुद्धियोग, यानी स्थिर विवेक से कर्म करने का मार्ग बताया है। वे आश्वासन देते हैं कि इस मार्ग में शुरुआत का प्रयास कभी नष्ट नहीं होता (अभिक्रमनाश) और इसका कोई उलटा फल (प्रत्यवाय) नहीं होता। इस धर्म का थोड़ा-सा आचरण भी महान भय से बचाता है। "महान भय" का अर्थ टीकाकार अलग-अलग लेते हैं: अनेक इसे जन्म-मरण का चक्र मानते हैं, कुछ इसे पाप या कर्तव्य से चूकने का भय मानते हैं।