देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
dehino'sminyathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā |tathā dehāntaraprāptirdhīrastatra na muhyati ||
जैसे इस शरीर में देहधारी आत्मा बचपन, जवानी और बुढ़ापे से गुज़रती है, वैसे ही वह दूसरे शरीर को भी प्राप्त करती है। धीर पुरुष इस विषय में मोहित नहीं होता।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि मृत्यु का शोक क्यों उचित नहीं है। जैसे देहधारी (देही) बचपन, जवानी और बुढ़ापे से गुज़रकर भी बना रहता है, वैसे ही मृत्यु पर वह दूसरे शरीर में चला जाता है। इसलिए स्थिर बुद्धि वाला धीर व्यक्ति इस परिवर्तन से मोह में नहीं पड़ता।