विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति ॥
vihāya kāmānyaḥ sarvānpumāṃścarati niḥspṛhaḥ |nirmamo nirahaṃkāraḥ sa śāṃtimadhigacchati ||
जो मनुष्य सब कामनाओं को त्यागकर लालसा से रहित होकर विचरता है, जिसमें "मेरा" का भाव नहीं है और अहंकार नहीं है, वह शांति को प्राप्त होता है।
व्याख्या
श्रीकृष्ण अर्जुन के सामने स्थितप्रज्ञ का वर्णन पूरा कर रहे हैं। पिछले श्लोक में कहा गया कि कामनाओं के पीछे भागने वाले को शांति नहीं मिलती; यहाँ उसका उलटा बताया है कि लालसा (स्पृहा), ममता और अहंकार छोड़ने से शांति मिलती है। परंपराओं में इस पर मतभेद है कि यह बाहरी त्याग है या कर्म करते हुए आंतरिक मुक्ति, पर सभी इसका सार भीतर की मुक्ति मानते हैं।