न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् ।अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धम्राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ॥
na hi prapaśyāmi mamāpanudyādyacchokamucchoṣaṇamindriyāṇām |avāpya bhūmāvasapatnamṛddhamrājyaṃ surāṇāmapi cādhipatyam ||
मुझे ऐसा कुछ भी नहीं दिखता जो मेरे इस शोक को दूर कर सके, जो मेरी इंद्रियों को सुखाए डाल रहा है, चाहे मुझे पृथ्वी पर शत्रुओं से रहित, समृद्ध राज्य मिल जाए, या देवताओं का आधिपत्य ही क्यों न मिल जाए।
व्याख्या
पिछले श्लोक में अर्जुन ने कृष्ण का शिष्य बनकर मार्गदर्शन माँगा था। यहाँ वह अपने दुख की गहराई बताता है। उसका कहना है कि यह शोक इंद्रियों की शक्ति तक सोख लेता है, और धरती का निष्कंटक राज्य या देवताओं का स्वामित्व जैसी बड़ी उपलब्धियाँ भी इसे नहीं मिटा सकतीं।