य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥
ya enaṃ vetti hantāraṃ yaścainaṃ manyate hatam |ubhau tau na vijānīto nāyaṃ hanti na hanyate ||
जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसे मरा हुआ मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते। यह आत्मा न किसी को मारती है और न मारी जाती है।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं, जो अपने स्वजनों को मारने के भय से युद्ध से हट रहा है। वे कहते हैं कि आत्मा, यानी भीतर की चेतन सत्ता, न मारती है और न मारी जाती है। इसलिए स्वयं को हत्यारा या शिकार मानना भूल है। आत्मा और परमात्मा के संबंध को अद्वैत अभिन्न मानता है, जबकि द्वैत और विशिष्टाद्वैत उसे भिन्न या आश्रित मानते हैं; पर इस बात पर सब सहमत हैं कि आत्मा हत्या के कर्म से अछूती रहती है।