कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥
kathaṃ bhīṣmamahaṃ saṃkhye droṇaṃ ca madhusūdana |iṣubhiḥ pratiyotsyāmi pūjārhāvarisūdana ||
हे मधुसूदन! युद्ध में मैं भीष्म और द्रोण पर बाणों से कैसे प्रहार करूँगा? हे अरिसूदन, वे दोनों तो पूजा के योग्य हैं।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण की फटकार के उत्तर में अर्जुन अपनी बात रखता है। वह कहता है कि पितामह भीष्म और गुरु द्रोण पूजनीय हैं, इसलिए उन पर बाण चलाना उसके लिए असंभव-सा है। अर्जुन की हिचक बड़ों के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य-भाव से उपजी है, केवल भय से नहीं, यद्यपि आगे कृष्ण इस विचार को परखते हैं।