जो सब प्राणियों के लिए रात है, उसमें संयमी जागता है। और जिसमें सब प्राणी जागते हैं, वह देखने वाले मुनि के लिए रात है।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का स्वरूप बता रहे हैं। यहाँ "रात" का अर्थ है वह जो किसी के लिए अंधकार में है, दिखता नहीं: आत्मतत्त्व साधारण लोगों के लिए रात जैसा है, पर संयमी उसमें जागता है; और इंद्रिय-भोग का संसार, जिसमें आम लोग जागते-दौड़ते हैं, सत्य देखने वाले मुनि के लिए रात जैसा है। परंपरागत टीकाकार प्रायः इसे आत्मा और सांसारिक जीवन के भेद के रूप में पढ़ते हैं, यद्यपि मुनि की जागरूकता का वर्णन वे अलग-अलग ढंग से करते हैं।