भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥
bhogaiśvaryaprasaktānāṃ tayāpahṛtacetasām |vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyate ||
जो लोग भोग और ऐश्वर्य में आसक्त हैं और उन वचनों से जिनका चित्त हर लिया गया है, उनमें निश्चय करने वाली बुद्धि समाधि में स्थिर नहीं होती।
व्याख्या
पिछले श्लोक की बात आगे बढ़ाते हुए कृष्ण उन लोगों की बात करते हैं जो स्वर्ग, भोग और सत्ता का वादा करने वाले कर्मकांड के आकर्षक शब्दों में उलझे हैं। इन इच्छाओं से उनका मन भटक जाता है, इसलिए समाधि के लिए आवश्यक दृढ़, एकाग्र निश्चय (व्यवसायात्मिका बुद्धि) उनमें नहीं बनता। समाधि को कुछ टीकाकार आत्मा या ईश्वर में स्थिर मन मानते हैं, तो कुछ उसे मन की आंतरिक स्थिरता के अर्थ में लेते हैं।