श्रीकृष्ण
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत । तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
dehī nityamavadhyo'yaṃ dehe sarvasya bhārata | tasmātsarvāṇi bhūtāni na tvaṃ śocitumarhasi ||
हे भारत! हर किसी के शरीर में रहने वाली यह आत्मा कभी मारी नहीं जा सकती। इसलिए तुम्हें किसी भी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिए।
व्याख्या अर्जुन अपने स्वजनों से युद्ध करने की सोचकर शोक में डूबा है, और कृष्ण यहाँ अपना पहला तर्क पूरा करते हैं। हर शरीर में रहने वाली देही यानी आत्मा को मारा नहीं जा सकता, इसलिए किसी प्राणी के लिए शोक करना उचित नहीं। यह श्लोक शरीर में रहने वाले को अविनाशी बताता है, मृत्यु या बिछोह के दुख को झुठलाता नहीं।
पिछला श्लोक 2.29 अध्याय 2 · ज्ञान का मार्ग अगला श्लोक 2.31
भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
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