जिसकी बुद्धि योग में स्थिर है, वह इसी जीवन में पुण्य और पाप, दोनों कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है। इसलिए तुम योग में लग जाओ; कर्मों में कुशलता ही योग है।
व्याख्या
पिछले श्लोक की बात आगे बढ़ाते हुए कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि फल की चाह छोड़कर समबुद्धि (बुद्धियोग) से कर्म करने वाला पुण्य (सुकृत) और पाप (दुष्कृत) दोनों के बंधन से मुक्त हो जाता है। फिर वे योग, यानी भीतर की स्थिरता और समता, को कर्मों में कुशलता (कर्मसु कौशलम्) बताते हैं। परंपराएँ इस कुशलता को अलग ढंग से समझाती हैं: कोई इसे फल-आसक्ति के बिना कर्म मानता है, तो कोई ईश्वर को अर्पण करके कर्म करना।