स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ॥
sthitaprajñasya kā bhāṣā samādhisthasya keśava |sthitadhīḥ kiṃ prabhāṣeta kimāsīta vrajeta kim ||
हे केशव! जिसकी बुद्धि स्थिर है और जो समाधि में स्थित है, उस मनुष्य का लक्षण क्या है? वह स्थिर बुद्धि वाला कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
व्याख्या
अर्जुन ने अभी कृष्ण से सुना कि जब उसकी बुद्धि समाधि (गहरी ध्यानमय एकाग्रता) में अचल होगी, तब वह योग पाएगा। अब वह पूछता है कि ऐसे स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाले) व्यक्ति को उसकी वाणी, बैठने और चलने से कैसे पहचानें। इसी प्रश्न से अध्याय के शेष भाग में स्थितप्रज्ञ का विस्तृत वर्णन शुरू होता है।