इन महान गुरुजनों को मारे बिना इस लोक में भिक्षा का अन्न खाकर जीना भी निश्चय ही कहीं अच्छा है। अर्थ और काम की चाह रखने वाले इन गुरुजनों को मारकर तो मैं यहाँ केवल रक्त से सने हुए भोग ही भोगूँगा।
व्याख्या
युद्धभूमि में शोक से व्याकुल अर्जुन कृष्ण से कहता है कि भीष्म और द्रोण जैसे गुरुओं को मारने से अच्छा है कि वह भीख माँगकर जी ले। उसका कहना है कि उनकी मृत्यु से मिला धन और सुख (अर्थ, काम) रक्त से सना होगा। "अर्थकामान्" का अर्थ कुछ टीकाकार गुरुजनों की धन-लालसा मानते हैं, कुछ अर्जुन की अपनी भोग-इच्छा से जोड़ते हैं; श्लोक स्वयं यह तय नहीं करता।