यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
yaḥ sarvatrānabhisnehastattatprāpya śubhāśubham |nābhinandati na dveṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā ||
जो व्यक्ति कहीं भी किसी से आसक्त नहीं है, और जो भी शुभ या अशुभ मिले, उसे पाकर न हर्षित होता है, न द्वेष करता है — उसकी प्रज्ञा स्थिर हो गई है।
व्याख्या
अर्जुन ने 2.54 में स्थितप्रज्ञ के लक्षण पूछे थे; कृष्ण उन्हीं का वर्णन आगे बढ़ा रहे हैं। ऐसा व्यक्ति आसक्ति (स्नेह) से मुक्त होता है और अच्छे-बुरे अनुभवों में समभाव रखता है — न उत्सव मनाता है, न कुढ़ता है। यहाँ प्रज्ञा का अर्थ स्थिर, दृढ़ बुद्धि है।