कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥
karmajaṃ buddhiyuktā hi phalaṃ tyaktvā manīṣiṇaḥ |janmabandhavinirmuktāḥ padaṃ gacchantyanāmayam ||
समत्व-बुद्धि से युक्त विवेकी लोग कर्म से उत्पन्न होने वाले फल का त्याग करके जन्म के बंधन से मुक्त हो जाते हैं और उस पद को प्राप्त करते हैं जो सब दुखों और दोषों से परे है।
व्याख्या
पिछले श्लोक की बात को आगे बढ़ाते हुए कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि समबुद्धि के साथ कर्म करने वाले ज्ञानी कर्म करते हुए भी उसके फल की आसक्ति छोड़ देते हैं। इससे वे जन्म-मृत्यु के चक्र के बंधन से छूटकर 'अनामय' पद पाते हैं, यानी ऐसी अवस्था जहाँ कोई रोग, दुख या विकार नहीं रहता। इस पद को अद्वैत परंपरा मुख्यतः आत्मज्ञान से मिलने वाली मुक्ति मानती है, जबकि वैष्णव परंपराएँ इसे भगवान विष्णु के परम धाम की प्राप्ति के रूप में पढ़ती हैं।