हे पार्थ! यही ब्राह्मी स्थिति है। इसे पाकर मनुष्य फिर मोहग्रस्त नहीं होता। अंत समय में भी इसमें स्थिर रहकर वह ब्रह्म में निर्वाण को प्राप्त होता है।
व्याख्या
दूसरे अध्याय के अंत में श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ का सार बताते हैं, जो तृष्णा, ममता और अहंकार से मुक्त है। इसे ब्राह्मी स्थिति कहा गया है, यानी परम सत्य ब्रह्म में टिका हुआ जीवन। इसे पाने पर मोह फिर नहीं लौटता, और जीवन के अंतिम क्षण में भी इसमें स्थित होने से ब्रह्मनिर्वाण मिलता है। परंपराओं में मतभेद है कि यह निराकार परम तत्त्व में लीन होना है या भगवान के सान्निध्य में मुक्ति।